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ब्लॉग्स (6)

शब्द कब महकने लगे ?कवि : मोहन रावल शब्द कब महकने लगे ,कुछ कह नहीं सकते,क्योंकि, उनका कोई मौसम नहीं होताहां ! यह देखा गया है किजब, अनुराग की बासंती बयार बहती हो,तब, शब्द महकने लगते हैं कभी -कभी कोई वयक्तित्व शब्दों का आकर ले कर अन्य व्यक्ति से एकाकार हो ... आगे पढ़ें...

हो गए शिथिल आज सभी अनुबंध,मधुमास की बयार में महका मकरंद्,भेज रहा है दिवस प्यार भरी पातीरजनी को भी है नींद कहाँ आती,चाँदनी चूनर रह-रह के खिसक जाती,अंतस में प्यार की पीर कसमसाती,खुल-खुल जा रहे हैं, कसे हुए बंध,मधुमास की बयार में महका मकरंद्.भेज दिए ... आगे पढ़ें...