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ब्लॉग्स (5)
हिंदी कविता- शब्द कब महकने लगे ?
शब्द कब महकने लगे ?कवि : मोहन रावल शब्द कब महकने लगे ,कुछ कह नहीं सकते,क्योंकि, उनका कोई मौसम नहीं होताहां ! यह देखा गया है किजब, अनुराग की बासंती बयार बहती हो,तब, शब्द महकने लगते हैं कभी -कभी कोई वयक्तित्व शब्दों का आकर ले कर अन्य व्यक्ति से एकाकार हो ...
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प्रतिक्रियाएँ[1] |
637 दृश्य | 1 रेटिंग
mohanlal rawal
द्वारा 4 अप्रैल, 2009 10:10 PM पर पोस्टेड
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हिंदी गीत : मधुमास में महका मकरंद्.
हो गए शिथिल आज सभी अनुबंध,मधुमास की बयार में महका मकरंद्,भेज रहा है दिवस प्यार भरी पातीरजनी को भी है नींद कहाँ आती,चाँदनी चूनर रह-रह के खिसक जाती,अंतस में प्यार की पीर कसमसाती,खुल-खुल जा रहे हैं, कसे हुए बंध,मधुमास की बयार में महका मकरंद्.भेज दिए ...
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mohanlal rawal
द्वारा 11 मार्च, 2009 10:07 PM पर पोस्टेड
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हिंदी गीत : बासंती मौसम आता है
वासंती मौसम आता हैकवि : मोहन रावल--वासंती मौसम आता है---जब मन में मिश्री घुलती है,जब देह भी रंग बदलती है,आँखों में सपने पलते हों,दर्द के शिखर पिघलते हों,जब हर कोई मन को भाता होवासंती मौसम आता है.जब खेतों में लहरें चलती है,हर कली में गंध मचलती है,किसलय पर ...
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mohanlal rawal
द्वारा 3 मार्च, 2009 9:03 PM पर पोस्टेड
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