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टैग्स: कविता


ब्लॉग्स (3)
हम पतझड़ के सूखे पान !आई आँधी उड़ जाएँगे ना कोई ठौर ठिकान !मजबूरी का जीवन जीतेकड़वाहट के आँसू पीतेफिर भी औठों पर मुस्कान !खानदान के नाज़ थे हमबच्चों की परवाज थे हम अब सूनापन बीयाबान ! जाने कब तक और जीयेंगे दिन में कितनी बार मरेंगे टूट रहा है स्वाभिमान ... आगे पढ़ें...

शब्द कब महकने लगे ?कवि : मोहन रावल शब्द कब महकने लगे ,कुछ कह नहीं सकते,क्योंकि, उनका कोई मौसम नहीं होताहां ! यह देखा गया है किजब, अनुराग की बासंती बयार बहती हो,तब, शब्द महकने लगते हैं कभी -कभी कोई वयक्तित्व शब्दों का आकर ले कर अन्य व्यक्ति से एकाकार हो ... आगे पढ़ें...

ओ ! मैकाले के मानस-पुत्रो ! ! तुमने काट डाली करोड़ों जिह्वाएँ,क्योंकि, तुम्हें अँदेशा था कि-करोड़ो लोगों का समवेत स्वर, छीन लेगा तुम्हारा राजमुकुट , और तुम नंगे कर दिए जाओगेजनता के सामने,कि तुम अवशेष होअँग्रेजी साम्राज्य के . तुमने स्वतंत्रता बेचकर,पाई थी ... आगे पढ़ें...