आओ हिंदी बचाएँ, संस्कृति बचाएँ|मित्रो ! देश परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है| पश्चिम की पूंजीवादी शक्तियाँ तथा भारत का भ्रष्ट पूंजीवादी वर्ग मिलकर भारतीय संस्कृति, भाषा,सभ्यता,धर्म में आमूल -चूल परिवर्तन कर भारत को अफ्रिका,आस्ट्रेलिया जैसा संस्कृति-हीन देश ... आगे पढ़ें...
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हिंदी में समस्या पूर्ति की परम्परा है|एक बार एक दरबारी कवि को राजा ने एक पंक्ति दी "कनक छरी सी कामिनी, काहे को कटि छीन" दूसरी पंक्ति कवि को पूरी करनी थी (शायद आलम नाम था कवि का) इनाम मिलने का भी सवाल था |कई दिनों तक सोचते रहे, दूसरी पंक्ति बन नहीं रही थी ... आगे पढ़ें...
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वसंतवासंती हवा के गुदगुदाने पर भी तुम नहीं हँसते।लाखों फूलों के रंग तुम्हारी आँखों में नही रचते।कोयल के मधुर गीत तुम्हें सम्मोहित नहीं करते।वासंती उत्सव में भी तुम्हारे पाँव नहीं थिरकते। तो सच में तुम मनुष्य नहीं कोई अज्ञात प्राणी हो।SpringVernal air ... आगे पढ़ें...
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नव वर्ष की शुभ कामना, नव वर्ष की शुभ कामना,आनंद से पूरित हो जीवन, कल्याण की हो भावना, कुंठित विचारों को फेंक दें, आशा की करें उद्भावना, पृथ्वी संरक्षण लक्ष्य हो, विकास की हो आराधना,स्नेह की सौगात बाँटें, विश्व-बंधुत्व ही हो उपासना. आगे पढ़ें...
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दीप जले जग ज्य़ोतिर्मय हो गया,फूल खिले जग पुष्पित हो गया,तुम मिले आनंद सृजित हो गया मोहन रावल आगे पढ़ें...
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आजादी के बादआजादी के बाद ही वे इस देश को छलने लगेकैसे रहे देश गुलाम उस ओर ही चलने लगेराष्ट्रभाषा के लिए पंद्रह वर्ष समय तय कियासंविधान में संशोधन करने वाले अब खलने लगेहिंदी को यूँ बर्बाद कर गद्दारों तुम्हें क्या मिलाहिंदी का सपना चूर कर छाती ... आगे पढ़ें...
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लोक-युद्धशंख फूंके जा रहे हैंरणभेरियों से गूँज रहा है आसमानदुर्योधन की चंडाल-चौकड़ीउन्मत्त है युद्ध के लिएशकुनी फेंक रहा है पासेहस्तिनापुर के सिंहासन के लिए।दुःशासन के कुचक्र ने निस्तेज कर दिया है पांडवों को शरशय्या पर लेटे हैं युधिष्ठिरआज कृष्ण भी भोगी ... आगे पढ़ें...
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मैं अभिमन्य़ुमैं समाज के बीच घिरा हूँअपनों ने ही मुझे घेरा हैस्वय़ं कृष्ण ने ही मुझेधकेला है मृत्य़ु के मुख मेंतो मुझे कोई भी नहींबचा सकता मरने सेहर युग में मारा ही जाता हैबेचारा अभिमन्यु । आगे पढ़ें...
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 2011समय, चाहता है परिवर्तनइसलिए बदल देता है हर साल कोऔर आ जाता है साल के बाद दूसरा नया साल।आदमी भी बदलता हैजो तेजी से बदलता-वह सब से अच्छा हैआदमी का नही बदलनाचेतन से जड़ होना है।नही बदलने वालाटूट जाता है प्रकृति सेऔर वे जीवित भागते हैं कब्रगाह ... आगे पढ़ें...
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ओ बूढ़ी हिंदी !ओ बूढ़ी हिंदी !तुम्हारा ममता भरा आंचलअब लोगों को नही सुहाताउन्हें अच्छा लगने लगा हैअंग्रेजी का मिनी स्कर्टताकि वे लुफ्त उठा सकेखुली टांगो के सौंदर्य काहमने आजादी के बाद लोगों का नजरिया बदला हैसंपत्ति और सेक्स हीलोगों का लक्ष्य बन गया ... आगे पढ़ें...
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हिन्दी कविता : अनुभूति, कवि- मोहन रावलअनुभूतिबड़ी परछाई से, आदमी बड़ा नही होता,जब, परछाई बड़ी होती है,तब,आदमी छोटा होता है।किसी से मिलने से प्रेम बढ़ता नही है,यदि प्रेम हो तो, मिलना हो जाता है।ब्रह्मांड हमारा हिस्सा नहीं,वरन हम ही,इस विराट ब्रह्मांड के ... आगे पढ़ें...
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रचनाकुछ लोग लिखकरअमर होना चाहते है उन्हें नही पता किअमर होकर ही लिखा जाता है।पहले स्वयं से हटकरहर चीज में प्रवेश करस्थूल को सूक्ष्म में फिर सूक्ष्म को भाव में भाव को शब्द में ढालकर शब्द में अर्थ की प्रतिष्ठा करजब, कुछ लिखते हैं, तब, लिखना होता है।जब, हम ... आगे पढ़ें...
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राजभाषाको उसका अधिकार चाहिए : कवि -- मोहन रावलराजभाषा को अधिकार चाहिएहिंदी को सबका प्यार चाहिएसंस्कृति की संरक्षक हमारी हिंदी भारतमाता के माथे की प्यारी बिंदीआजादी के संघर्ष की कहानी हिंदीशहीदों की गाथाओं की रवानी हिंदीराजभाषा को सबका दुलार ... आगे पढ़ें...
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मज़दूर और मशीन कवि : मोहन रावलआधुनिक मशीनों ने, बेदखल कर दिया मजदूरों को,मशीनें और तकनीशियन्,युग का इतिहास रचते हैं.पूँजी ने पसीने को, चलन से बाहर कर दिया,स्वचालित मशीनें और विशेषज्ञ्,सभ्यता के केंद्र में है.मनुष्य मशीनें बनाकर्,हार गया है मशीनों से,इसीलिए ... आगे पढ़ें...
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