हिंदी कविता : डा. पद्मा सिंह : रोशनी का दरख्त
रोशनी का दरख्त
एक घुड़्सवार
लगातार कर रहा है यात्रा
एक मछली तैर रही है
सतह पर अनिवार
लगातार शून्य से एकालाप
कभी ना खत्म होने वाला
इंतज़ार
नहीं !
कोई नहीं है
फिर भी लगता है
अभी-अभी कोई
गुजर गया है छूकर !
हर मनुष्य के भीतर
समाया है ब्रह्मांड
नदी पहाड़
इंद्रधनुष के सातों रंग
समुद्र और आकाश
रेत के अनाम बियावान भी
गुजरते वक्त के साथ ही
बदल जाता है इतिहास
सत्य भी हो जाता है
अतीत की दास्ताँ
फिर भी खुला रहता है
एक चोर दरवाजा
रेंगते हैं सवालों के सरीसृप
बदलते हैं
ठीक बारह बजे
वक्त की डिब्बी से
निकलती है वह चिड़िया
और गुम हो जाती है
फिर-फिर प्रकट होने
तयशुदा वक्त पर
क्यों इंतज़ार करती है रात
एक पल !
दिन के रास्ते से
यात्रा करता अविराम
सूरज परदेसी
रात की फैली बाँहों से
छिटकता निर्मोही
समा जाता है अनाम गहराइयों में
हजारों हजार आँखें
उग आती है अँधेरे में
भयावह है फिर भी
कितना मासूम है अँधेरा
वह बुनता है सपने
नींद की पलकों पर
वह लौटा लाएगा सूरज
झुटपुटे में
वही बोएगा एक दिन
रोशनी का बीज
धरती की कोख में
फिर दरख्त बन कर
फैल जाएगा आकाश में !
कवयित्री : पद्मा सिंह
एफ/6 रेडियो कालोनी इंदौर, म. प्र.
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