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हिन्दी कविता : मशीन और मज़दूर :


मज़दूर और मशीन
कवि : मोहन रावल

आधुनिक मशीनों ने,
बेदखल कर दिया मजदूरों को,
मशीनें और तकनीशियन्,
युग का इतिहास रचते हैं.

पूँजी ने पसीने को,
चलन से बाहर कर दिया,
स्वचालित मशीनें और विशेषज्ञ्,
सभ्यता के केंद्र में है.

मनुष्य मशीनें बनाकर्,
हार गया है मशीनों से,
इसीलिए मानवता का अस्तित्व
निगल गई भीमकाय मशीनें.

वस्तुत: सर्वहारा ! हारा है,
पूँजीगत तकनालाजी से,
मशीनों की तानाशाही के आगे
नत-मस्तक है मज़दूर का पसीना !

कवि : मोहन रावल




प्रतिक्रियाएँ

Re: हिन्दी कविता : मशीन और मज़दूर :
अजब तमाशा – गजब तमाशा हिंदी कविता बचाने का महान उद्योग अशोक कुमार पांडेय जी कर रहे हैं वो भी अपने स्वनामी महाकवि अशोक वाजपई के साथ मिलकर. एक ओर पाण्डेय जी विनायक सेन को बचाने के उपक्रम में लगे थे अब कविता बचाने में लग गए हैं. कविता इतनी बेचारी हो गई है कि पाण्डेय जी की मोहताज हो गई है और उनके श्रीचरणों में लोट लगा रही है, गुहार कर रही है कि मुझे बचा लो हे दयानिधान. और दयानिधान अब वाजपई जी के अभय में हैं, कल को विश्वरंजन जी के अभय में हो जायेंगे. अब भी मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के सारे प्रगतिशील विश्वरंजन जी के शरणागत हो चुके हैं, वे हिंदी साहित्य को बचा रहे हैं. पाण्डेय जी सच कहिये कि आपको कविता कि इतनी चिंता कब से हो गई ? वैतरणी आप को पार करनी है वाजपई जी कि पूंछ पकड़ कर या कविता को. नामवर जी और वाजपई जी का वरद हस्त मिल जाये फिर क्या है मिल गई मंजिल. भाई वह क्या खूब हिकमत है ?
Re: हिन्दी कविता : मशीन और मज़दूर :
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