मज़दूर और मशीन
कवि : मोहन रावल
आधुनिक मशीनों ने,
बेदखल कर दिया मजदूरों को,
मशीनें और तकनीशियन्,
युग का इतिहास रचते हैं.
पूँजी ने पसीने को,
चलन से बाहर कर दिया,
स्वचालित मशीनें और विशेषज्ञ्,
सभ्यता के केंद्र में है.
मनुष्य मशीनें बनाकर्,
हार गया है मशीनों से,
इसीलिए मानवता का अस्तित्व
निगल गई भीमकाय मशीनें.
वस्तुत: सर्वहारा ! हारा है,
पूँजीगत तकनालाजी से,
मशीनों की तानाशाही के आगे
नत-मस्तक है मज़दूर का पसीना !
कवि : मोहन रावल
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