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हिंदी कविता : कवि : मणि खेड़ेकर




हम पतझड़ के सूखे पान !
आई आँधी उड़ जाएँगे
ना कोई ठौर ठिकान !

मजबूरी का जीवन जीते
कड़वाहट के आँसू पीते
फिर भी औठों पर मुस्कान !

खानदान के नाज़ थे हम
बच्चों की परवाज थे हम
अब सूनापन बीयाबान !

जाने कब तक और जीयेंगे
दिन में कितनी बार मरेंगे
टूट रहा है स्वाभिमान !

खुशियाँ सारी हवन हो गई
दु:ख की छाया सघन हो गई
सूखे अधरों के है गान !

अब ढलान का है वक्त
जीवन संध्या बहुत है सख्त
गुजरे कल की हम पहचान !

कौन पढ़ेगा दर्द हमारा
बागवान फिरता लाचारा
अपने घर में हैं अनजान !

कवि : मणि खेड़ेकर


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