हम पतझड़ के सूखे पान !
आई आँधी उड़ जाएँगे
ना कोई ठौर ठिकान !
मजबूरी का जीवन जीते
कड़वाहट के आँसू पीते
फिर भी औठों पर मुस्कान !
खानदान के नाज़ थे हम
बच्चों की परवाज थे हम
अब सूनापन बीयाबान !
जाने कब तक और जीयेंगे
दिन में कितनी बार मरेंगे
टूट रहा है स्वाभिमान !
खुशियाँ सारी हवन हो गई
दु:ख की छाया सघन हो गई
सूखे अधरों के है गान !
अब ढलान का है वक्त
जीवन संध्या बहुत है सख्त
गुजरे कल की हम पहचान !
कौन पढ़ेगा दर्द हमारा
बागवान फिरता लाचारा
अपने घर में हैं अनजान !
कवि : मणि खेड़ेकर
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