शब्द कब महकने लगे ,
कुछ कह नहीं सकते,
क्योंकि, उनका
कोई मौसम नहीं होता
हां ! यह देखा गया है कि
जब, अनुराग की
बासंती बयार बहती हो,
तब, शब्द महकने लगते हैं
कभी -कभी कोई वयक्तित्व
शब्दों का आकर ले कर
अन्य व्यक्ति से एकाकार हो
अद्वैत हो जाता है,
फिर वह शब्द-ब्रह्म बनकर्,
आनंद-ब्रह्म हो जाता है
तब, शब्द अमर लगते हैं
कभी-कभी कोई चेहरा
किसी दूसरे चेहरे से
इतना एकाकार हो जाता है
कि भेद ही समाप्त हो जाता है
और एक नई चीज बन जाता है
तब्, शब्द उसे प्रेमाद्वेत कहते हैं !
कवि : मोहन रावल
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