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हिंदी गीत : वसंत

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वसंत ‌‌‌----
जंगल में महक उठी आज पुरवैया,
मनवा में चहक उठी सोन चिरैया .

रुप तेरा बन गया तरुओं के किसलय,
तैरी हँसी ने है फूल खिलाएँ,
महुआ की सुगंध में तेरी ही सुगंध रची,
टेसू ने अधरों के रंग चुराए,
तो.धीरज की डगमग होने लगी नैया
मनवा में चहक उठी सोन चिरैया !

कोयल के मीठे-मीठे बोल तेरे बोल हैं
झरनों के छंद तेरे गीत अनमोल हैं
सरसों का खेत नही, चूनर है ये तेरी
अलसी का लहँगा सितारे गोल हैं
तो, जाऊँ नहीं स्वर्ग, यहीं छालूँ मढै‌या
मनवा में चहक उठी सोन चिरैया !

चाँदनी ने रंग तेरे अँग से चुराया
चेहरे की लाली से गुलाल लजाया
चितवन के चुंबक ने खीँच लिया मन
ओठों ने आज गीत में दर्द गाया
तो, राधा को ढूँढ रहा रास रचैया
मनवा में चहक उठी सोन चिरैया !

गीतकार : मोहन रावल





प्रतिक्रियाएँ

Re: हिंदी गीत : वसंत
संयमित श्रृंगार की यह रचना, बहुत सुंदर गढी गयी है। शब्दों द्वारा अनुभूति को पाठक को वही अनुभूति उसी उत्कटता से , करवाना, कवि कर्म मानता हूं। इस कर्ममें कवि निश्चित सफल हुआ है। धन्यवाद।
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