
--- गरीबों का आजादी-पर्व--
मुफलिसों की चिट्ठी शहीदों के नाम है,
देश तो स्वतंत्र है, पर, हम गुलाम हैं .
अंगार पर चले हम,
मझधार पर पले हम,
रोशन हो देश अपना,
मशाल-सा जले हम,
पर व्यर्थ गई कुर्बानी,
हर आँख में है पानी,
बलिदानियों का कैसा हुआ अंजाम है?
देश तो स्वतंत्र है, पर, हम गुलाम हैं !
आँगन में भूख रोए,
बिन कफन लाश ढोएँ,
घर आसमाँ है अपना,
पत्थरों पर हम सोए,
हमें कैसी यह आजादी?
जैसे बेगानी-सी शहजादी
जिंदगी हमारी यहाँ बस, गुमनाम है,
देश तो स्वतंत्र है, पर, हम गुलाम हैं !
सूरज चुरा लिया है,
ईमान खा लिया है,
सारा ये मुल्क अपना,
एक हरम बना लिया है,
लुटती यहाँ जवानी,
शराब बनी है पानी,
गद्दारों की जिंदगी एक रंगीन शाम है,
देश तो स्वतंत्र है पर, हम गुलाम हैं !
मुट्ठी में जोश नही है,
चेहरे पर रोश नही है,
कैसा युवा हमारा ?
कोई सुभाष नहीं है,
मर गया है पानी,
बेबस यहाँ जवानी,
तिरंगे की भी न रही, अब वो शान है,
देश तो स्वतंत्र है, पर, हम गुलाम हैं !
अब हमको है कसम,
सहेंगे नहीं सितम,
खून खौलता हमारा,
रोता है जब वतन,
देंगें हम कुर्बानी,
नई गंगा होगी लानी,
तब सारा जहां कहेगा, भारत महान है,
देश तो स्वतंत्र है, पर, हम गुलाम हैं !
कवि: मोहन रावल

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