
धर्म के ज्वलामुखी जब धधकते हैं तब, मानवता अपना अस्तित्व खो देती है. लोग खून के प्यासे ही नहीं होते, अपितु, सब कुछ ध्वंस कर विजेता के रूप में अट्टहास करना चाहते हैं. आज धार्मिक व्यक्ति मिलना मुश्किल है, पर्, धार्मिक सेनाएँ मिल जाएगीं. धर्म के नाम पर नेता भीड़ इकट्ठी कर, उसे धार्मिक सेना बना कर अपना उल्लू सीधा करते हैं. हर सांप्रदायिक दंगे के पीछे वोट की राजनीति काम कर करती है. वोट के माध्यम से नेता सत्ता पर काबिज होकर सरकारी खजाने का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए करता है. यही संस्कृतियों के संघर्ष के नाम पर सारी दुनिया में हो रहा है, ऐसे माहोल में प्रजातंत्र और विश्व-बंधुत्व शब्द खोखले लगने लगते हैं. प्रत्येक नागरिक को इस धार्मिक षड़्यंत्र से बचना चाहिए.
आलेख : मोहन रावल