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भविष्य के गर्भ में भारतीय भाषाओं का विनाश.



सामाजिक और राजनीतिक जीवन का भविष्य होता नही, बनाया जाता है. विश्व के बुद्धिमान और शक्तिशाली राष्ट्र अपने हिसाब से दुनिया का भविष्य लिख रहे है. योजनाबद्ध तरीके से किसी देश में साँ‌स्कृतिक परिवर्तन कर, अपना अनुगामी, लाभ लेने के लिए बनाया जा रहा है. यदि कोई देश बदलने के लिए तैयार नही होता है तो, उसे नेस्तनाबूद कर, जबरन नई व्यवस्था लाद दी जाती है. भविष्य के आईने में हम देख रहे हैं कि सन 2050 तक भारत के सभी लोग और युवा अधिकतर अंग्रेजी बोलने लगेंगे. चौ‌किए नहीं ! यह होने जा रहा है इसी अपने देश में.
ज्ञान आयोग की सिफारिश है कि संपूर्ण भारत में कक्षा पहली से अंग्रेजी अनिवार्य रूप से पढ़ाई जाए और कक्षा तीसरी से सभी विषयों की पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी होगा. तब भारत की सभी भाषाएँ‌ मात्र बोलियाँ‌ बन कर रह जाएगी. भाषाओं के साथ ही भारतीय संस्कृति भी विलुप्त हो जाएगी. और यह सब हो रहा है उदारीकरण और भूमंडलीकरण के नाम पर, जिसका एक ही लक्ष्य "बाजार: कुटुम्बकम"

आलेख लेखक : मोहन रावल
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