
आकाश की अनुभूति करने लगा हूं .
अपनी आंखों से
अदृश्य को देखने लगा हूँ .
मुझे सुखद लगता है,
भावनाओं का असीम ब्रह्मांड.
मेरी जिजीविषा से मृत्यु,
हास्यास्पद बन गई है.
और आनंद का केसेट,
पूरे जोर से बजता है.
अंतस को प्रिय हो गया परिवर्तन,
होने लगा महारास का नर्तन.
यह भावना का उत्कर्ष है,
जीवन हर्ष ! महा हर्ष है ! !
कवि: मोहन रावल

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